Tuesday, May 3, 2016


कला का पुजारी





कला का पुजारी मैं तो
कला का पुजारी
न मैं सलाह का जुआरी
मैं सलाह का न जुआरी
मैं हूँ  कला का पुजारी

ये अश्कों की सुराही
मेरे अश्कों की सुराही
गवाह है हमारी
की मैं पी गया वो प्याला
कम्बख्तों की मधुशाला
मैं कला का सिपाही
मैं कला का सिपाही

अल्लाह का हूँ बन्दा मैं
मुझसे खुदा बोलते हैं
मैं जब पंछी सी उड़ान भरता हूँ
ताले खुलने लगते हैं
मैं खुद से मिलने लगता हूँ
मैं कला का सौदाई
हाँ मैं कला का सौदाई

जब चिड़िया चहकने लगती हैं
तब मुझसे बोलने लगती हैं
के तू हीर है हमारा
तू हीर है हमारा
यादें आने लगती हैं
दर्द कुरेधने लगती हैं
ये है कला की जुदाई
हाँ ये कला की जुदाई

जब नगीने शान्ति होती है
और मनन में क्रान्ति होती हैं
तब एक सैलाब उठता है
बदन पर बर्फ गिरती है
जवाबों के बीज के भाँती
ऐसी  कला की कांति होती है
कला की कांति होती हैं

जब सूरज उगने लगता है
या शाम ढलने लगती है
चलते चलते पथ पर अकेले
ख़ामोशी बोलने लगती है
जब गौर से सुनता हूँ
तो मिले कला की परछाई
कला की परछाई

कला का पुजारी
मेरी रूह करे परियों की सवारी
जहाँ देयोदर की चादर ओढ़े
खड़ी हो बर्फ की पहाड़ी
और मादक फर्राति हवा
कहे तू कला का हरजाई
तू कला का हरजाई


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