तट
छूटती , बुलाती, महकती, मँडराती
बस, हवा ज़िंदगी !
उछलती, टकराती, उठती, समेटती
ये मौज, ज़िंदगी…
सहती, रहती, अटल, अडिग
टुकड़ा, टुकड़ा, ये चट्टान ज़िंदगी ।
निगलती, चिपकती, गिरती, ठहरती
ज़ालिम, है क्या रेत ज़िंदगी ?
ख़ामोश, फैला, गहरा, ठहरा
बेहिस , ये सागर
रंगीन, चमकता, उजला - उजला
इंद्रधनुष, ये प्रकाश
पालता, निहारता, बदलता, चारो ओंर
हल्का, ये अम्बर…
साहिल पे पड़ते ये पग
दिगंत को छूती ये नज़र
गुब्बारे सा झूलता बदन
ध्यान में डूबा मन - मगन
