Thursday, May 8, 2025

 फ़क़ीर


कभी मैं देखूँ ख़ुद को फ़क़ीरा 

कभी मैं खुद को खुदा देखता हुँ 

पलटकर देखूँ गर इस सारे जहान में

फ़क़ीरा खुदा को रकीब देखता हुँ 


जहाँ भी जिधर भी घुमाऊँ ये नज़रें 

सुरंगों के ऊपर इस क़दर हैं खड़ा 

है कौन जीव जिसका क़िला देखता हुँ 

फ़क़ीरी कर खुदाई बेपनहा देखता हुँ 


मैं सही और ग़लत, गुनाह देखता हुँ 

मैं रहमत ए खुदाई वजह सोचता हुँ 

मक़सद बड़ा है के क़िस्मत नशीं है ?

फ़क़ीर हुँ खुदा को रहनुमा सोचता हुँ 


जब खुली आँखों से देखता हुँ मैं सपने

तब तारों को तोड़, आइना देखता हुँ 

सुरंगों से चला था सुरंगे देखता हुँ 

ख़ुद की अलग और उसकी अलग बस सबकी अलग देखता हुँ...


मैं कहाँ जाऊँ मैं किधर जाऊँ मैं

फ़क़ीर हुँ ख़ुदा-दर तक सफ़र सोचता हुँ 

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