Thursday, May 8, 2025

ख़फ़ा


आपको हमारी,

जज़्बात-ए-ख़्वाहिश मंज़ूर कहाँ ?

महज़ एक गुज़ारिश, मसरूफ जहाँ !


आपको हमारी,

अश्क़-ए-तबाही दिखी कहाँ ?

क्या गर्ज़ करेंगे नज़ारा, हैं तँज़ नीगाँह !


आपके हमारे,

अब दीदार-ए-यार होते कहाँ

बेफ़िज़ूल ये ज़िंदगी हमारे दरमियाँ !


आपसे हमारी,

अब बेसबब होती है बहंस।

ग़ौर मसले पे है तकल्लुफ़ यहाँ !


आपके हमारे,

मीजाज़-ए-हुँज़्न अब मिलते कहाँ?

तबस्सुम लबों पर ना मयस्सर यहाँ !


आपसे बेहतर क्या होगी सलीक़ि

जब ज़िंदगी बे बंदगी की, ख़ुश हो ज़मां

तलाश-ए-तज़व्वुफ़ ना हो निसार-ए-हयात

इख़्तियार ये ज़िंदगी हमें देती कहाँ 

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