ख़फ़ा
आपको हमारी,
जज़्बात-ए-ख़्वाहिश मंज़ूर कहाँ ?
महज़ एक गुज़ारिश, मसरूफ जहाँ !
आपको हमारी,
अश्क़-ए-तबाही दिखी कहाँ ?
क्या गर्ज़ करेंगे नज़ारा, हैं तँज़ नीगाँह !
आपके हमारे,
अब दीदार-ए-यार होते कहाँ
बेफ़िज़ूल ये ज़िंदगी हमारे दरमियाँ !
आपसे हमारी,
अब बेसबब होती है बहंस।
ग़ौर मसले पे है तकल्लुफ़ यहाँ !
आपके हमारे,
मीजाज़-ए-हुँज़्न अब मिलते कहाँ?
तबस्सुम लबों पर ना मयस्सर यहाँ !
आपसे बेहतर क्या होगी सलीक़ि
जब ज़िंदगी बे बंदगी की, ख़ुश हो ज़मां
तलाश-ए-तज़व्वुफ़ ना हो निसार-ए-हयात
इख़्तियार ये ज़िंदगी हमें देती कहाँ

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