Friday, January 9, 2026

 Maroon


I have strangled the sleep already
But this dream doesn't die

songs are squeals, out of tune
nothing blooms a melody, I pry

soul is drenched, I lament in pain
My sun is scorched and swoon
I muddled in both the shares
the brightly lit night and in no moon

night covered the day, I wonder
the doorstep split me asunder
I am in search of my own story
words without page wail for plunder

never rested in peace, my soul
body got tore, fell short of it's goal
However I measure, whenever
my shoe never fits the sole

 राधा मोरी 

मेरी बाँसुरिया लौटायी दे 
ओ राधा मोरी 
मेरी बाँसुरिया लौटायी दए
हम बात करें कैसन तोसे
अरे इधर तो देख
हमसे नैना तो लड़ायी रे 
तुम जानत हु की हम का कहेंगे 
यूँ मुसकायी तू, 
हम एकही बार बताइबे

तू लायिले हमार बछिया
ओका ना लयी जाए घाँस चराए
बस एकही बार हम कहेंगे तुमसे
ऊ बाँसुरी हमका लौटायी दय
 
ना दे माखन की गागरिया हमका
क़सम हम कहत हैं तुम्हारी सौ राधे
हम कभी ना माखन खैबे
और ना हम कभी ना ओका चुराइबे

बस बात कहें हैं हम तोसे 
और वो एकही बात कहेंगे 
ऊ हमार कोयलिया है 
हमका बस ऊ दिलाईदे
बाँसुरिया मोरी हमका दिलाईदे

सुदामा मोरा... सुदामा...!
ना जाने कबसे ना आवा मोरा
ऐ राधे समझ! अच्छा हम ना जाबे
जा अच्छा अब मोरी बंशी तो लाइदे

दुई मुट्ठी दिए आए रहे पिछली बार
ना जाने कबसे बुलाए रहा है
जाएँ ओका दयेखें, बताएँ हम ओका दयेखे
तुम हमारी मूरलिया दो, हम बजाई दे 
समझी की ऊ का कहे रहा है, 
ओका समझाएँ... ऐक बार समझाई दें

ऊ सभई हैं हमार गोपियाँ 
अरे कौनों ना इतना सताए रे 
ओ राधा मोरी! हम बताए तो रहे हैं
कोई ना इत्ता सुहावे, जित्ता तू सताई वे
हमरी बाँसुरिया लौटायी दय
तू हमारी बाँसुरिया लौटायी दे 

" मैय्या देखो कैसन हमका सतायी ये "
हम तुमका कैसन बतायी रे... मैय्या...
जित्ता ई करत हैं उत्ता हमय कोई नहीं सतायी रे 
मैय्या मोरी हमरी बाँसुरिया दिलवायी दे 
राधा मोरी! 

भोर हुई मोर दयेखो काहे इत्ता चिल्लाए रे 
बड़ा अजब है मेरा शीश दरद में, 
और तू ई कोहराम मचाई रे
आ सरकती आत्मा मेरी 
तू ऐसा दर्द दिलाई रे 
मोहनिया तू राधा से 
तू राधा से ऊ बंसिया 
जरूर लयी आओ रे 

Thursday, May 8, 2025

तट 


छूटती , बुलाती, महकती, मँडराती 

बस, हवा ज़िंदगी !


उछलती, टकराती, उठती, समेटती 

ये मौज, ज़िंदगी…


सहती, रहती, अटल, अडिग 

टुकड़ा, टुकड़ा, ये चट्टान ज़िंदगी ।


निगलती, चिपकती, गिरती, ठहरती 

ज़ालिम, है क्या  रेत ज़िंदगी ?


ख़ामोश, फैला, गहरा, ठहरा

बेहिस , ये सागर


रंगीन, चमकता, उजला - उजला 

इंद्रधनुष, ये प्रकाश 


पालता, निहारता, बदलता, चारो ओंर 

हल्का, ये अम्बर…


साहिल पे पड़ते ये पग 

दिगंत को छूती ये नज़र 

गुब्बारे सा झूलता बदन 

ध्यान में डूबा मन - मगन

शिव 


जो था, बटोर के

घर को अपने छोड़ के

जाएँगे वहाँ कहीं,

यहाँ भाग भाग भाग है


ना हो शहर का कोलाहल

ना हो ज़ाहिर बेचैनियाँ

परिंदे भी एक बार

धधक धधक धधक धधक


निगाह नीचे जब पड़े

एक बार उन्हें लगे

पर तो तेरे नहीं

आज़ाद मुझसे

कुछ ज़्यादा ही


समय को जियेंगे अब

लेंगे अपनी करवटें

आज़ादी की ये घड़ी

उठा दूँ, वक़्त की दरी


जग गया भाड़ में

सोयेंगे अब पहाड़ पे

तापमान मापते

झील का सफर नापते


पत्थरों के बीच से

चला मैं रास्ता खोजते

पहाड़ों सी उचाइयाँ

चढ़ने की ललक भरी


चढ़ना ही चाह है

और कोई शिखर नहीं

टँग जाऊँगा श्वांस पे

मालूम ना होंगे पग कभी


तत्व का आभास है

मिल जाने की प्यास है

मिल जाऊँ जो ख़ुद से मैं

निखर आएगा शिखर मेरा

मेरा मेरा मेरा मेरा 

खुद को... खुदा को...


मैं जाता गलियों गलियों में

ढूँढता उनकी दहलीज़ों में

दिखा, वो ग़ुब्बारा, महक जैसे

साबुन की, उड़े, वो नीला आसमान

लगे जाना पहचाना सा


सँकरी रास्ते, खुरदुरी दीवारें

वो पीक जानी पहचानी सी

वो लाल और कूद गया मैं नाला काला

धूप की सुगंध और भपका हवा का

लगे जाना पहचाना सा


घूमता हूँ और घूमता हूँ

पर रास्ता भटक गया,

वो मंदिर वहाँ, खिड़की, घर, पर्दा

है पेड़ यहाँ भी, खुली जगह

जानी पहचानी  सी


है खाईं वक़्त की यहाँ कहीं

परिंदे हैं पर अलग हैं,

हवा भी उतनी स्थिर नहीं चलती

पर धूप वही छाँव वही, बस रास्ते नये

लगे जाने पहचाने से


चप्पल की चाप पड़ी कहीं उधर

ढूँढता हूँ,

सूख रहे कपड़े, गुलाबी सूरज

प्यासी शाम, एक पतंग

है यहाँ भी, है वहाँ भी

फिर भी नहीं मिलता

आभास हुआ पर,

महसूस अधूरा

ख़ुद को…

ख़ुदा को… 

जंग


इंतज़ार है मुझे, लगा हूँ तलाश पे

फ़क़त है अँधेरा चल रहा लाश पे 

सो जाओ तुम जहाँ से उठा हूँ मैं अदा से 

हट जाओ आज मेरी जंग है खुदा से


आ जा देख लूँ तेरा जलवा जलाल में

उठ जाए नक़ाब ना रह तू हिजाब में 

हो जाए हिसाब जीत लें जो बदा है 

जंग जिससे है मेरी वो मेरा खुदा है 


बस इत्तेफाक़ था पहले उसे  तुम मिल गए 

आ एक और दाँव आ, हैं जन्मों से दिलजले

सहता रहा जिसे, वो जीतता रहा सदा ही

हो ना हो है मेरी जंग जिससे है वो खुदा ही 


छीन लाऊँ तू बोल मेरी जाँ कबसे अदा है 

मेरी जान वापस कर अभी अगर तू खुदा है 


अदा से... बदा है। सदा ही... अदा है। 

खुदा से खुदा है खुदा ही खुदा है । 

 इलहाम 


है ना कोई फूल जो मिले बहार में

कोई फूल उतना खिलता ही नहीं 

जो भाये मुझे हो इस मज़ार में 

वो शोख़, फ़रिश्ते से मिलती नहीं 


मिल जाए मुझे बस इतनी इजाज़त 

के निहारूँ उन फूलों को मैं ढूँढूँ

होगा कायर नहीं उसे देख ले जो 

गुज़ारिश है मेरी के उन्हें बस मैं छू लूँ 


ख़ालिस हों निगाह मेरी हो अक़्ल-ए-मुजस्सम

मिलने की ग़मज़दा कोई तारीख़ तो होती 

मिलता मुक़द्दर से होता मैं बिस्मिल 

महकता ये सोसन, बारिश कामिल तो होती 


देखते जो दो चार इधर भी ठहकते 

इस क़ब्र पे फूलों का मजमा लगा होता 

खेलते उनसे हम अपने ढंग से फिर 

अखलाक ए फ़रिश्ते को फिर इलहाम होता