शिव
जो था, बटोर के
घर को अपने छोड़ के
जाएँगे वहाँ कहीं,
यहाँ भाग भाग भाग है
ना हो शहर का कोलाहल
ना हो ज़ाहिर बेचैनियाँ
परिंदे भी एक बार
धधक धधक धधक धधक
निगाह नीचे जब पड़े
एक बार उन्हें लगे
पर तो तेरे नहीं
आज़ाद मुझसे
कुछ ज़्यादा ही
समय को जियेंगे अब
लेंगे अपनी करवटें
आज़ादी की ये घड़ी
उठा दूँ, वक़्त की दरी
जग गया भाड़ में
सोयेंगे अब पहाड़ पे
तापमान मापते
झील का सफर नापते
पत्थरों के बीच से
चला मैं रास्ता खोजते
पहाड़ों सी उचाइयाँ
चढ़ने की ललक भरी
चढ़ना ही चाह है
और कोई शिखर नहीं
टँग जाऊँगा श्वांस पे
मालूम ना होंगे पग कभी
तत्व का आभास है
मिल जाने की प्यास है
मिल जाऊँ जो ख़ुद से मैं
निखर आएगा शिखर मेरा
मेरा मेरा मेरा मेरा

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