Thursday, May 8, 2025

 रूह-ए-कश्मीर


गर्म, महकती, नम सुगंध

नर्म, चमकती धरती कण-कण

कल-कल मीठा सरोवर उपवन में

रंगीन, मनोहर चिनार मगन


श्वेत, उजला, मख़मल बदन

गुलाबी, गहरा, जीवंत चमन

हैं सर्द-महर मिज़ाज अंजुमन के

है क्यूँ धुएं में, क्यूँ धुएं में

फिर क्यूँ धुएँ में लिपटे कफ़न


है सुप्त आसमान ये शिखर पे

के मुँह खोले है बड़ा गगन

ओस थिरकती तारों सी चेहरे पर

क्यूँ चाँद टपके पलकों से आंसू बन


स्मृति मनोहर, कराहती प्रियतम की

सब चीख की अंतिम प्रतिध्वनि लगे

प्यासी, बुलाती ये सृष्टि हर घड़ी

मैं अब तृप्ति चाहूँ, तृप्ति चाहूँ

बस तृप्ति चाहूँ सरोवर से


होश में खड़ा देख खुद को

क्युँ पाता मूर्छित चट्टानों पर पड़ा

टूटे पड़े मेरे जहाज़ अरमानों से

मेरा कश्मीर यूँ लुटता रहा, बटता रहा,

नुचता रहा, क्युँ कटा पड़ा

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