Thursday, May 8, 2025

खुद को... खुदा को...


मैं जाता गलियों गलियों में

ढूँढता उनकी दहलीज़ों में

दिखा, वो ग़ुब्बारा, महक जैसे

साबुन की, उड़े, वो नीला आसमान

लगे जाना पहचाना सा


सँकरी रास्ते, खुरदुरी दीवारें

वो पीक जानी पहचानी सी

वो लाल और कूद गया मैं नाला काला

धूप की सुगंध और भपका हवा का

लगे जाना पहचाना सा


घूमता हूँ और घूमता हूँ

पर रास्ता भटक गया,

वो मंदिर वहाँ, खिड़की, घर, पर्दा

है पेड़ यहाँ भी, खुली जगह

जानी पहचानी  सी


है खाईं वक़्त की यहाँ कहीं

परिंदे हैं पर अलग हैं,

हवा भी उतनी स्थिर नहीं चलती

पर धूप वही छाँव वही, बस रास्ते नये

लगे जाने पहचाने से


चप्पल की चाप पड़ी कहीं उधर

ढूँढता हूँ,

सूख रहे कपड़े, गुलाबी सूरज

प्यासी शाम, एक पतंग

है यहाँ भी, है वहाँ भी

फिर भी नहीं मिलता

आभास हुआ पर,

महसूस अधूरा

ख़ुद को…

ख़ुदा को… 

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