Tuesday, November 10, 2009

जब सागर सा हिलोरें लेता मन


जब सागर सा हिलोरें लेता मन
सुविचार और कुविचार करते मंथन
पूर्नाचित्त जाता है मैथ
उभरता नया विचार जैसे अमृत
तब कुछ नया लगता अपना दर्पण
एक मकसद बनकर आता स्वप्ना
कैद सा लगने लगता जीवन
कुछ करने गुजरने की इक्षा में
उमंग से भर जाता तन्न मन
शुरुआत का कुछ पता नहीं
बस वक़्त से होती बेहद जलन
भंवरा हूँ, प्यारा लगे हर सुमन
तब निद्रा न सताए नयन
कुछ भी मॅन को न करे मगन
हर थकान का होता दमन
किस राह का करूँ चयन
उत्साह का न हो सके आंकलन
जब नए विचारों का होता जन्म
तब बचे दिन हमें लगते कम
हिम्मत नहीं किसी हंसती में
जो रोक सके हमारे कदम
हर पल पुलकित होते हैं हम
जब सागर सा हिलोरें लेता मन

काश तुम्हे पता होता...

पर मालूम है मुझे,
तुझसे हर पल प्यार करता रहूँगा'
अपनी हर जीत से तुझे नवाजता रहूँगा'
झुका है सर तेरे आगे
हर जीत के साथ झुकाता रहूँगा
तू कलि मेरे दिल के आँगन की
मैं माली तुझे सजाता रहूँगा