Monday, May 9, 2016



मंज़र



एक दिल में धंसा हो खंजर
और सामने पड़ा हो मंज़र
कबूतरों की घुटी आवाज़ों में
मैं सिसकियाँ लेता फिर्ता हूँ

खुद - आ खुदा
इसी तरह खुद को 
बुलाते रहते हैं
ये बात दिल - की दिल को
दोहराते रहते हैं
के तू कब समझेगा कमज़र्फ
खुदा से ही आएगा वो हर्फ़

लिखी होगी उसमें तदबीर मेरी
अरमानों में मेरे तस्वीर मेरी
मिलेगी सवालों के जंगलों में
जवाबों की देहरी
होगी गवाह उसकी तकदीर मेरी

दांव लगा है, हाँ दांव लगा है
मैं करता रहूँगा याद 
जब तक तुझे पहुँचती नहीं फ़रियाद
तुझ बिन मैं बर्बाद
के मुझ बिन तू आबाद

असीम प्रेम में हम
खुद से बंधते रहते हैं
बढ़ते चलते उठते गिरते
फकीरों के माफिक
उनसे हम दुआ मांगते हैं
गुमशुदगी के आँगन में
बार बार तुझे पुकारते हैं

आओ मिल जाओ मुझसे
तो क्या हुआ के तेरा खौफ है
मैं आशिक़, मैं माशूक तेरा
मेरी हर खता मवाफ है



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