Thursday, May 12, 2016



कितनी दूर आ गए...


ढूंढते हुए तुझे 
वो न जाने 
कितनी दूर आ गए
उमड़ते हुए लिपटने 
वो बखूबी छा गए 

चूमने की आरज़ू में 
इस कदर तरस गए
बदला खुद को 
तेरी चाहत में
और बरस गए

तेरी आगोश में आके
बेसुद्ध बिखरे
समेट लें मुझे यूँ
की मेरी सांसें उखड़े
पर न जाने क्यूँ...
क्यूँ आप सिहर गए

पलटकर देखा खुद को
... बहुत दूर आ गए

इस उल्फत में महकें
तराशें उमंगें
खुमारी में तेरी
मेरे जिस्म-ओ-जान 
बहक गए
इधर चिकोटा, काटा उधर
कराहते हम कड़क गए

कभी सुलझता तेरी
आहों में 
तो कभी उलझता 
बहारों में 
देख के हमारी दीवानगी
वो झुलस गए, हम सुलझ गए
समय तुझमें कहीं
कभी खुद में समा गए

पलटकर देखा  तुझको
... बहुत दूर आ गए


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