तुम आज भी याद आते हो...
जाओ चले जाओ,
चाहे जितनी दूर, जब भी
मिल पाना, मुड़ पाना
शायद...
मनासिब ना हो कभी
पलटकर सुन पाना भी
शायद मुश्किल हो तभी
ना जाने किस मोड़ पे जो
फँसी डोर, टूटती सी हो
और जिससे जुड़ी उसकी
आवाज़ गूँजती सी हो
बुलाती सी हो
तब उस एक ख़याल को आने देना
हाँ माना ग़ुस्ताख़ है वो
कमजर्फ़ ज़रा दग़ाबाज़ है वो
हाँ...
बढ़ते क़दम होंगे, थोड़ा ठहर जाना
बेतुखी थी वो बात,
शर्मनाक थी वो रात,
ये सोच के बेधड़क गुज़र ना जाना
कोहरा सा मुँह से फूँकते हुए
उससे कुछ कहना, बिगड़ जाना
मक़सद था सिर्फ़ जब ख़ुद को
साबित करना ...
उन गुज़रे पल को थोड़ा याद करना
तब तुम्हें थोड़ी मुश्किल होगी
मुस्कुराहट बचकानी और
कड़वाहट जानी पहचानी सी होगी
उस पल थोड़ा हौंसला रखना
और हमदर्दी से सुनना
के ऐ दोस्त,
तुम आज भी याद आते हो
