फ़क़ीर
कभी मैं देखूँ ख़ुद को फ़क़ीरा
कभी मैं खुद को खुदा देखता हुँ
पलटकर देखूँ गर इस सारे जहान में
फ़क़ीरा खुदा को रकीब देखता हुँ
जहाँ भी जिधर भी घुमाऊँ ये नज़रें
सुरंगों के ऊपर इस क़दर हैं खड़ा
है कौन जीव जिसका क़िला देखता हुँ
फ़क़ीरी कर खुदाई बेपनहा देखता हुँ
मैं सही और ग़लत, गुनाह देखता हुँ
मैं रहमत ए खुदाई वजह सोचता हुँ
मक़सद बड़ा है के क़िस्मत नशीं है ?
फ़क़ीर हुँ खुदा को रहनुमा सोचता हुँ
जब खुली आँखों से देखता हुँ मैं सपने
तब तारों को तोड़, आइना देखता हुँ
सुरंगों से चला था सुरंगे देखता हुँ
ख़ुद की अलग और उसकी अलग बस सबकी अलग देखता हुँ...
मैं कहाँ जाऊँ मैं किधर जाऊँ मैं
फ़क़ीर हुँ ख़ुदा-दर तक सफ़र सोचता हुँ

